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वाराणसी: नगीने, कांच, ज़री ताजिया के साथ निकली बनारस की सबसे बड़ी ‘बुर्राक की ताजिया’

वाराणसी: मुहर्रम शहादत का त्यौहार माना जाता है. इस त्योहार में इस्लामिक कैलेंडर के नए साल की भी शुरुआत होती है. मोहर्रम हिजरी संवत का पहला महीना माना जाता है. इस महीने को शहादत के महीने के रूप में जाना जाता है, क्योंकि इसी महीने में इमाम हुसैन ने धर्म और इंसानियत की रक्षा के लिए जंग लड़कर अपनी शहादत दी थी. ताजिया लकड़ी और कपड़ों से गुंबदनुमा आकर का बनाया जाता है और इसमें इमाम हुसैन की कब्र के प्रतीक के रूप में बनाया जाता है. ताजिया को झांकी की तरह सजाते हैं और एक शहीद की अर्थी की तरह इसका सम्मान करते हुए उसे कर्बला में दफन करते हैं.

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बनारस में मोहर्रम और ताजिए की झलक

बनारस में मोहर्रम और ताजिए की झलक बेहद खास होती है. ऐसा ही रहा भेलूपुर थाना क्षेत्र के गौरीगंज इलाके की ताजिया. इस ताजिए को बनाने के लिए शीशम की लकड़ी के साथ केवल कांच का प्रयोग किया गया. इसके बाद यहां से जुलूस निकला जुलूस निकलने के बाद दूल्हा बना युवक नंगे पांव अंगारों पर ही चलता है। इसी तरह से शिवाला में भी मनाया जाता है. यहां से निकलने वाला जुलुस दुर्गाकुंड के इमामबाड़ा से लेकर फातमान होते हुए चेतगंज नई सड़क तब जाकर वापस गोदौलिया होते हुए शिवाला पहुंचता है.

बजरडीहा इलाके के कुड़िया सराय सुरजन इलाके की सबसे बड़ी ताजिया निकलती है. यहां की ताजी की खास बात यह है कि बजरडीहा में कुल 52 अखाड़े हैं उन अखाड़ों से युवक शहादत नामा पढ़ने के बाद झूमर और डांडिया खेलते हैं.

यहाँ मनाए जाने वाले ताजिया एक और अनोखी कड़ी देखने को मिलती है यह है नगीने की ताजिया. नगीने की ताजिया पठानी टोला में रखी जाती है इसकी खास बात यह है कि यह बेहद ही सुंदर और आकर्षक की है जो कि 40 वर्ष पहले नगीने के पत्थर से बनाई गई है. यह ताजिया हर वर्ष यहीं पर रखी जाती है जिसे कभी उठाया नहीं जाता.

ताजी की अनोखी कड़ी में आगे है रांगे की ताजिया लल्लापुरा में रखे जाने वाली इस ताजिया की खासियत यह है कि इसे ढाई सौ वर्ष पहले बनाया गया था . इस ताजिए की कलाकारी में पूरी तरह से जरी और कलमकारी का नायाब नमूना दिखता है.

इसी तरीके से मशहूर है बुर्राक की ताजिया आदमपुर थाना अंतर्गत बागरा बाद मोहल्ले में रखे जाने वाली है. ताजिया बनारस की सबसे बड़ी और प्रमुख ताजिया है. इस ताजिए को लेकर निकलने वाली जुलूस में पचास हजार से भी ज्यादा लोग शामिल होते हैं. यह सबसे लंबी दूरी भी तय करती है. इस ताजिए की खास बात यह है जो इसे अन्य ताजियों से अलग बनाती है की इसमें हिंदू समुदाय के लोग काफी संख्या में शामिल होते हैं.

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