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‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, मगर संसद में मत पहुंचाओ! बनारस को पहली महिला सांसद का इंतजार

ह्यबेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओह्ण, मगर संसद में मत पहुंचाओ!

 

वाराणसी: आजादी के 70 वर्षों में लोकसभा के कई चुनाव हो चुके हैं और वाराणसी राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील रहा है. इसके बावजूद इन 70 वर्षों में विश्व की धार्मिक राजधानी वाराणसी (काशी) से एक भी महिला को संसद में जाने का मौका नहीं मिला है. जिले के मतदाताओं ने देश को प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री तो दे दिए हैं लेकिन एक बार भी किसी एक महिला को सांसद नहीं बनाया है. पूर्वांचल से समय-समय पर महिला सांसद चुनी गईं, लेकिन बनारस को यह सौभाग्य अब तक प्राप्त नहीं हुआ. कांग्रेस व भाजपा महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 फीसदी भागीदारी की बात तो करती हैं लेकिन दोनों ही पार्टियों ने वास्तविक धरातल पर कभी महिलाओं को इतनी हिस्सेदारी नहीं दी. अब तक हुए लोकसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियों ने किसी भी महिला नेता को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया.

प्रत्याशी बनाने से भी पार्टीयों ने किया है किनारा-

हालांकि कई चुनावों में महिला प्रत्याशियों ने अलग-अलग दलों से अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन विजय एक बार भी नहीं मिली. जिले में महिला मतदाताओं की संख्या कोई कम नहीं है. कुल मतदाताओं में से 40 प्रतिशत से अधिक संख्या महिला मतदाताओं की है. इसके बाद भी एक बार भी महिला प्रत्याशी को लोकसभा चुनाव में विजय नहीं मिली है. इसके बाद भी राजनीतिक दलों की ओर से महिला प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में नहीं उतारा जाता है.

इस मामले में राजनीतिक दलों का नजरिया भी ज्यादा उदारवादी नहीं रहा है. प्रतिनिधि तो तब चुनते जब कोई पार्टी किसी महिला को प्रत्याशी बनाती, दमदार प्रत्याशी. लेकिन किसी राजनीतिक दल ने इसकी पहल नहीं की. चाहे वह कांग्रेस रही हो या कम्यूनिस्ट पार्टी अथवा जनता दल या भारतीय जनता पार्टी. ये उन राजनीतिक दलों का हाल है जो लगातार महिला आरक्षण की बात करते हैं. लेकिन संसद में महिला आरक्षण बिल कभी पास नहीं होता. संसद में तो तभी इस मुद्दे को बल मिले जब राजनीतिक दलों में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की इच्छा हो.

जिले में नारी जागृति को लेकर कई बार आंदोलन छेड़े गए, नारी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की गईं. वो वाराणसी जहां बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूणार्नंद संस्कृत विश्वविद्यालय सहित चार मान्यता प्राप्त और कुल पांच विश्वविद्यालय हैं. जहां शिक्षा की अलख जगाने के लिए एनी बेसेंट ने सेंट्रल हिंदू स्कूल, बेसेंट थियोसाफिकल स्कूल तक की स्थापना की. राजघाट में बसंता कॉलेज और गांधी अध्ययन पीठ की स्थापना हुई. लेकिन 1951-51 से लेकर 2014 तक इस संसदीय क्षेत्र से एक भी महिला प्रतिनिधि नहीं चुनी गई.

मंदिर में नहीं संसद में प्रवेश चाहिए-

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे जुमले गढ़ने वाली भाजपा हो या कांग्रेस, साथ ही अन्य दल भी, जेंडर के मसले पर सामाजिक न्याय वालों की निर्लज्जता के ही सबूत हैं. देवियों के मंदिरों वाले राज्य में, और देश में भी, देवियां मंदिरों में सिर्फ पूजने के लिए हैं, सड़कों पर वे सुरक्षित चल नहीं सकतीं, बिना आरक्षण संसद में आधी आबादी के रूप में उन्हें प्रवेश मिल नहीं सकता. हमारी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की आवाज दबी रहने का असर सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है. ज्यादा महिलाओं के चुने जाने से हमारी संसद और विधानसभाएं एकदम शक्तिशाली भले ही न हो जाएं लेकिन उनकी मौजूदगी से महिलाओं का सशक्तिकरण तो जरूर होगा. अगर सांसद और विधायक महिलाएं होंगी तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन प्रताड़ना के मामलों में पुलिस और प्रशासन पर दबाव जरुर पड़ेगा.

वाराणसी ने अब तक जिन्हें बनाया अपना सांसद-

1952 ,1957,1962- रघुनाथ सिंह (कांग्रेस)

1967- सत्यनारायण सिंह (भाकपा)

1971- राजाराम शास्त्री (कांग्रेस)

1977- चन्द्रशेखर सिंह (जनता पार्टी)

1980- पं. कमलापति त्रिपाठी (कांग्रेस)

1984- श्यामलाल यादव (कांग्रेस)

1989- अनिल शास्त्री (जनता दल)

1991- श्रीष चन्द्र दिक्षित (भाजपा)

1996, 1998, 1999- शंकर प्रसाद जायसवाल (भाजपा)

2004- डॉ राजेश मिश्रा (कांग्रेस)

2009- डॉ मुरली मनोहर जोशी (भाजपा)

2014- नरेंद्र दामोदर दास मोदी (भाजपा)

 

 

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