November 26, 2020
वाराणसी अपडेट

मिशन शक्ति: बनारस की सरिता ने फोटोग्राफी छोड़ शुरू किया कारोबार, महिलाओं को दे रहीं रोजगार

जिले की पहली महिला फोटोग्राफर की रूप में पहचान बनाने वाली सरिता उपाध्याय अब कारोबार करती हैं। उनकी बदौलत 12 से अधिक महिलाएं भी काम कर रही हैं जबकि 30 से ज्यादा महिलाओं को स्वरोजगार मिला है। काशी विद्यापीठ ब्लॉक में सूजाबाद की रहने वाली सरिता पहले शिक्षण संस्थाओं व महिलाओं के कार्यक्रम में फोटोग्राफी करती थीं। दो साल पहले एक सड़क हादसे में सरिता और उनके पति को गंभीर चोट लग गयी। इससे फोटोग्राफी का काम छूट गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर ऋण लिया और चुनरी, कृष्ण झूला, अगरबत्ती और महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधन से जुड़ी सामग्रियां बनाने लगीं। उनके हाथों की बारीकियों ने उन्हें अलग पहचान दी। हादसे के बाद आर्थिक रूप से संकट से घिरा परिवार फिर से उठने लगा। अब उनकी बनाई चुनरी की डिमांड बड़े, बड़े शोरूम तक होने लगी है। उन्होंने खुद को मजबूत करने के बाद आसपास के महिलाओं को भी जोड़ना शुरू किया। उनके साथ की महिलाएं हस्तशिल्प के कई उत्पाद बना रही हैं। सरिता चुनरी के कार्य को बड़े स्तर पर करना चाहती हैं।

पीपीई किट व मास्क बना राधिका कोरोना योद्धा बनीं, कर्ज से भी उबारा

जिला मुख्यालय से सुदूर स्थित गड़खड़ा गांव की राधिका भारद्वाज ने कोरोना काल में स्वास्थ्य विभाग के लिए पीपीई किट और मास्क बनाया। विभाग ने उन्हें कोरोना योद्धा की पहचान दिलायी। राधिका पिछले ढाई साल से अगरबत्ती बनाती हैं। उनकी अगरबत्तियां कई दुकानों पर बिकती हैं। उन्होंने बताया कि शादी के बाद वह गृहिणी की तरह घर में व्यस्त थीं। पति खेती करते थे। उनके मन में शुरू से अपना कारोबार शुरू करने का निश्चय था। उस वक्त आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए वह किसी प्रयास तक नहीं पहुंच पाईं। उन्होंने एनआरएलएम विभाग से ऋण लेकर अगरबत्ती बनाना शुरू किया। शुरूआत में उन्होंने आसपास की महिलाओं की मदद ली। उनकी मेहनत और अगरबत्ती की गुणवत्ता से काम चल पड़ा। अगरबत्ती ने पूरे इलाके में उनकी पहचान बना दी है। कोरोना के संक्रमण शुरू हुआ तब उन्होंने मास्क बनाकर बांटना शुरू किया। बात प्रशासन तक पहुंची तो उन्हें पहले पांच मास्क बनाने का आर्डर मिला। काम अच्छा हुआ तो आर्डर मिलते गये। राधिका ने आठ हजार मास्क और 1200 पीपीई किट बनाई। उन्होंने इस कार्य में 100 से ज्यादा महिलाओं को जोड़ा। राधिका अब तक 210 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार दिलवा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि कई महिलाएं कर्ज से भी उबर चुकी हैं। अब अच्छी बचत कर रही हैं।

 शबीना ने मां का काम आगे बढ़ाया, हजार महिलाओं को रोजगार दिया

शबीना ने कम उम्र में ही न केवल अपनी मां के व्यवसाय को आगे बढ़ाया बल्कि करीब 1000 महिलाओं को विभिन्न रोजगार व कारोबार से जोड़ भी चुकी हैं। नक्खीघाट की रहने वाली शबीना लखनऊ विश्वविद्यालय व काशी विद्यापीठ से पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उनकी मां लहंगा व दुपट्टा बनाती थीं। शबीना में बचपन के काम को देख उसे करने की ललक थी। मां के इंतकाल के बाद उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ उनके काम को आगे बढ़ाया। वह बनारसी साड़ियों के कतरन से दुपट्टा, शूट, लहंगा आदि बनाती हैं। शबीना का चार माह पहले निकाह हुआ है। उससे पहले वह अपने घर में मुखिया की तरह जिम्मेदारी निभाती रहीं। उनके साथ महिलाओं की लम्बी फौज है। उन महिलाओं को शबीना समय-समय पर उपयोगी सलाह भी देती रहती हैं। शबीना ने बताया कि उनके उत्पाद दिल्ली, लखनऊ और मुंबई की विभिन्न प्रदर्शनियों में लगाए जाते हैं। इसमें डूडा व प्रशासन मदद करता है।

Courtesy :https://www.livehinustan.com/

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